Friday, 22 March 2019

वो तुम हो सिर्फ तुम हो.... और कोई नहीं.

राह से में जब जब भटका
हाथ पकड़ मुझे राह दिखाई तुमने
में कई बार गिरा, कई बार रूका
मुझे मंजिल बता राह दिखाई तुमने
में फिर गिरा, फिर उठा
मेरी बाह जो थामी वो तुम ने
लाख बार गिरते है हम
फिर हाथ बढ़ा के जो थाम ले
सच खुदा नहीं है
फिर लगा खुदा सा है कोई
जो हमें गिरने पर थाम ले
बाह फैला हमें समेट ले, हमें घेर ले
पुछता हूँ में सब से
कौन है वह. .. कौन है
जो हर पग है
हर पल है
हर छन है
हमें घेरे हुए

तुम मेरे लिये बनी हो ........मैं तेरे लिये .

बस करो
प्यार से देखना मुझे
इन आँखों में बस
प्यार ही प्यार है बस तेरे लिये
तुम मुझसे मुंह मोड़ाे
या मेरी तकदीर से
नजर तुम को भी आ रहा है
कौन हूँ मैं तेरे लिये
लाख तुम मिन्नत कर लो
मुझसे ये सब छुपा ने की
सब जानती तुम हो
कौन हूँ मैं तेरे लिये
देखो धुम धुम कर ये दुनिया
फिर हमें एक दूसरे के सामने ले आती है
तुम ये खुद से छुपाओ
या में सब से
पर ये तय है पहले से
तुम मेरे लिये बनी हो मैं तेरे लिये

तुम बिन में....

तुम बिन में कुछ नहीं
बस एक शरीर हूं और कुछ नहीं
जब से तुझसे जुड़ा हूं
लगा जैसे में खुद से मिला हूं
नजदीक से बस एक तुम ने
छुआ है इस मन को
कल तक सिर्फ एक जिस्म था
आज जैसे रूह से मिला हूं खुद की
मुझको तुम ने बनाया
बनाकर भूल गए तुम
कभी मिल न सके कभी आ न सके
व्यस्त रहे , मुझसे छुपकर तुम


Thursday, 14 March 2019

मेरे सपने और मैं

बात उन दिनों की है जब मै काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह बस भटक रहा था काम के लिए जाने क्याें मुझे ऐसा लगने लगा लोगो के दिल में मेरे लिये या मेरे जैसे किसी भी व्यक्ति के लिए हमदर्दी क्यों नहीं है हम जिस समाज में रहते हैं वहां एक उम्र के बाद हमें काम के लिए घर के बाहर निकल न ही पड़ता है काम वो काम जिसे कर के घर में पैसा आ सके हम अपने लोगों के लिए कुछ कर सके ये ही सोच ले में घर से बहार निकल कमाने की आस में निकल पड़ा हर किसी की तरह मेरे दिल में भी कुछ सपने कुछ अरमान थे में बहुत भटका इधर से उधर जाने कहाँ कहां पर कहते है जिन्दगी हम को वहीं ले आती जहाँ हम जाना चाहते हैं और जो पाना चाहते वही हम को एक दिन मिल के रहता. मेरा मान ना है ज़िन्दगी में सपने देखो उन के पीछे भागो पर रुको मत कुछ ठोकरें हर एक के नसीब में शामिल होती है असल ये ही वह पल होते है जो हमे ये राह दिखाती है कि ठौकरों से मत डरे बस और आगे बढ़ने की कोशिश कर के रहो. मैं इन ही ठौकरों में कई बार भटका लड़खड़ाया बस एक सपना कुछ करना है कुछ कर दिखाना है कभी सीधे तौर पर यह समझ सके कि मैं हारा नही बल्कि कुछ न कुछ करता रहा मैने जिन्दगी वहां से शुरू करी जिस बात को याद कर गर्व मैनें कितने नीचे से शुरूआत की कोशिश करता रहा हमेशा आगे निकल ने की मुझे याद है मैनें कभी सपने में भी नही सोचा था कि मैं कभी लिख कर अपने यह पल आप सभी से साझा करूगा आज भी मेरे घर में किसी को कुछ पता है कि मैं चोरी छुपे कभी गीत कभी कविता रचता हूं मैं आज भी कुछ लिखने बैठता हूं तो यह सोच में पड़ जाता हूं क्या में कभी इतना अच्छा लिख सकता हूँ कि लोग ज्यादा से ज्यादा यहां आ कर मुझे पढ सके समझ सके मेरी कविता को मुझको में आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ कि आप सभी यहाँ पर आकर जो वक्त मुझे और मेरे लिखे ब्लॉग पढ के देते है असल में ही वो सपने है जो में देखा करता था सोचा करता था दुनिया में कहीं कोई कभी मुझे भी पढे महसूस करे कि मैं भी हू कही, कही दूर पर इन शब्दो से आप सभी के करीब बेहद करीब इसी दिल में.

Saturday, 9 March 2019

एक ही है न कि अलग अलग


तुम से मिलकर


शुभ प्रभात मित्रों


मेरे गीत तुम्हारे

मेरे गीत अब भी तुम्हारे
दिल के करीब हैं
दिल अब भी
धड़कता है मेरे लिये
मैं जानता हूँ तुम भी
हम किस के कितने
दिल के पास है
दिल से दूर
ये मन ही है
जिसे हम छलते है रोकते है बढने से
मन में आकंनसाये बहुत है
उन आकंनसाओ में तुम
चाहे तुम से छुपा लू या खुद से
मन ही मन सब तुम को पता है
क्या हू में क्या हो तुम मुझमें..

मेरी बातें तुम से....

मेरी बातें तुम से
तुम मेरी बातों में
सपने तुम से
तुम मेरे सपनो में
तुम मुझसे में तुम से
जुड़े है जन्मो जन्मो से
लाख सही फासलो में हम तुम
लाख सही उलझन रिश्ताें में
लाख करे फिर बाते अपनी
मिलकर बिखरकर है हम एक ही
नजरों से है दूर यदि पर
सपने बाकी अब भी खाली
खाली घर में, में कितना खाली
तुम कितने में कितना खाली

Saturday, 2 March 2019

आखिरी रात...

वो कागज का कोना
वो बारिश में भीगा
जुड़ा हिस्सा हूँ में
तेरे नाम का
खुद ही से कई बार
मिलता रहा हुं
जुड़ा न किसी से
ये शब्द आज हैं
कोई नाम मेरा
पुकारे कही से
दीवारे है न कहीं
न कोई पास आज है
तुझे भूलना ही
अच्छा रहेगा
ये सितम की मेरी
आखिरी रात है|

Friday, 1 March 2019

एक खत... वो शब्द.

पते नही बदलते
न खत बदलते है
बदल जाते है
तो शब्द
वो जज्बात
जो कुछ देर पहले
अन्दर पल रहे थे
कुछ कह रहे थे
कुछ बदल रहे थे
कुछ सिमटे खामोश
बिखरकर चुपचाप
एक खत
किसी की लत बन
सज संवर रहे थे
सोचा, खामोश है
बिखेर दो
पर "पता" न था
न ठिकाना
न बहाना
न किनारा
जो बहकर
लग जाये
किनारे..........!
मुझ सा बेशक.


खोयी खोयी सी वो..

कभी कभी मन में
कोई तलाश उठती है
कोई अनजाना , पुकारता चेहरा
खड़ी टटोलती मन दिखती है
कुछ कहना उस से है
पर क्या वो सोचती होगी
खोयी खोयी सी वो
हर दिन एक दिखती है


ठहरी सी जिंदगी में

सिर्फ कागजों सी कोरी मेरी जिंदगी में हो तुम मेरे गम से और इस दिल से निकल गये हो तुम खाली सा है हर कोना क्यों बिखर गए हैं हम तुम मिलकर...