Friday, 5 April 2019

जिन्दगी की कतरन...

जब जब तुम मेरी जिंदगी में आई
तब तब में शामिल रहा
फिर जैसे लगा
कुछ छुट गया हो पीछे
राह में था पर राह छूट रही हो जैसे
लगा मुझे जैसे कुछ छुट रहा हो पीछे
मैं जानता हूँ मै लायक नहीं था कल भी
आज सब है पर फिर भी एक खालीपन सा है
अन्दर ही अन्दर जैसे टूट गया हूँ मैं
सब बिखर गया हो मुझसे
मैं अन्दर से हिम्मत कितनी ही कर लू
पर टूटकर बिखरा हर बार में ही हूं
जानता हूँ सब किस्मत के हाथों है
टूट ना बिखरना
हार कर ही सही
हारा हुं में अपनो से ही
गम भर रहा ये
मैं क्या हूँ
क्या से क्या हो गया मैं
अब खोने को कुछ नहीं था
फिर भी पाने की चाह मन में थी
वो सब पाने की
जो कतरनों की शक्ल में
मुझसे फिसरते रहे ,छूटते रहे




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