Monday, 25 February 2019

सपने है क्या...

जब जब जिंदगी से में भागता रहा
अपने में कमीया देखी
खुद से बाहर झॉकता रहा
सपने तब भी मुझ से कोसो दूर थे
कोशिश करी पर सब नाकाम रहा
राह से में कई बार भटका
जो मन्जिले मिली उन की बाह थामें
मैं जरूर कुछ दूर निकला पर उतना भी नहीं
कि मैं लपक के पा लेता हर खुशी
शौक कई थे पर हाथ जैसे अब भी खाली थे
मैं लाख कोशिश कर लू
सपने सच कर ने की
फिर सपने ही तो है
अपने हुए कब
अकसर में शामिल हू
अब भी उन सपनो में
जब अपनो के बीच रहते रहते
हम सपनो से दूर निकल आते है
असल में सपने है क्या
अपनो से ज्यादा अहमियत
इन की कुछ भी नहीं... 

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